Utilizing Participatory Storytelling to Educate – A session at APHA 2019

1On Nov 4, 2019, Sahiyo’s co-founder Mariya Taher took part in a round-table session at the American Public Health Association’s (APHA) Annual Conference in Philadelphia, Pennsylvania to discuss the Voices to End FGM/C project. Participants were able to view a sample of the digital stories created by survivors. They were also able to learn how by utilizing participatory storytelling methods, we can educate communities, health professionals, and policymakers on female genital cutting. For more information, visit APHA’s website.

એક સાઈકોથેરૅપિસ્ટ તરીકે, હું ક્યારેય ખતનાની ભલામણ નહિં કરું

(This article was first published in English on December 10, 2016. Read the English version here.)

લેખક : અનામી

ઉંમર : 36 વર્ષ

દેશ : ભારત

હું એક માનસિક આરોગ્ય ચિકિત્સક છું અને છેલ્લા 16 વર્ષોથી હું તેનું કાઉન્સેલિંગ અને થેરાપી આપી રહી છું. મારા ઘરનાં લોકો મારી એક કઝિનની સેરિમનિ વિષે બોલતા હતા ત્યારે અનાયાસે જ મને ‘ખતના’(ટાઈપ 1 એફ.જી.એમ.) વિષે જાણવા મળ્યું. હું વધારે માહિતી મેળવવા માંગતી હતી. મને સમજાયું નહિં કે હું પણ તે પ્રક્રિયા હેઠળથી પસાર થઈ હતી. મને વધારે કંઈ યાદ નથી, બસ આટલું કે મને બળતરા થતી હતી અને ત્યારબાદ મારી માં અને નાની દ્વારા તપાસવામાં આવી રહી હતી.

તે એક હરામની બોટી હતી જેને મારા શરીરમાંથી કાઢી નાખવામાં આવી હોવાથી મારે તે વિષે ક્યારેય વાત કરવી જોઈએ નહિં તેવા વાતાવરણમાં હું મોટી થઈ. મને કહેવામાં આવ્યું હતુ કે હવે તુ શુદ્ધ થઈ ગઈ છે. હું મોટી થઈ તેમ મેં સાઈકૉલોજીનો અભ્યાસ કર્યો, હું એફ.જી.એમ. વિષેનો એક આર્ટિકલ વાંચતી હતી ત્યારે અચાનક જ મને સમજાય ગયું કે તે દિવસે મારી સાથે શું બન્યું હતુ. મને ધક્કો લાગ્યો પરંતુ, તેને સ્વીકારવા સિવાય મારી પાસે કોઈ વિકલ્પ નહોતો કારણ કે જે કંઈ બન્યું તેની કોઈ અસર સમજાઈ નહોતી – મારા પ્રગતિશિલ માં-બાપને પણ નહિં.

મારૂં જીવન અન્ય છોકરીઓની જેમ આગળ વધવા લાગ્યું. મારૂં લગ્ન જીવન, ખાસ કરીને સેક્સ પર તેની કોઈ અસર થઈ નહિં. મારૂં સેક્સ્યુઅલ જીવન અને ઑર્ગેઝમ્સ પણ સંતોષપૂર્ણ હતા અને મેં મહેસુસ કર્યું કે મારા પર ખતનાનીં કોઈ મોટી અસર થઈ નહોતી અથવા સાત વર્ષની ઉંમરે હું જે પ્રક્રિયા હેઠળથી પસાર થઈ તેનાં આઘાતનો સામનો કરવા મેં એ બાબતને એકદમ દબાવી દીધી હતી.

જો કે, મને યાદ છે કે બાળકનાં જન્મ સમયે મારે એપિસિઓટોમી પ્રક્રિયા કરાવવી પડી હતી. UNFPA દ્વારા કરવામાં આવેલ એક સ્ટડી અનુસાર, એક સામાન્ય બૈરીની સરખામણીએ જે બૈરી પર જેનિટલ કટિંગની પ્રક્રિયા કરવામાં આવી હોય તેને સિઝેઅરિયન સેક્શન અને એપિસિઓટોમી ની વધારે જરૂર પડે છે અને બાળકનાં જન્મ પછી વધારે સમય હૉસ્પિટલમાં રહેવું પડે છે.

આ વર્ષની શરૂઆતમાં પીઅર સુપરવિઝનમાં, મારી સાથે જે કંઈ બન્યું તેની પ્રક્રિયાને મેં ધીરે-ધીરે સમજી અને તેને જીવનનાં એક ભાગ રૂપે લીધી. મને એ બાબત પાછળથી સમજાઈ કે એફ.જી.એમ. ની અસરો થાય છે. હકીકતમાં તે આત્માને જખમો આપે છે અને આપણને આશ્ચર્ય થાય કે શું આ પ્રક્રિયા કરવી ખરેખર જરૂરી છે.

ખતના પ્રક્રિયા લાંબા સમય સુધી માનસિક તણાવ આપી શકે છે. કુટુંબનાં સભ્યો દ્વારા ભરોસો તોડવાની લાગણીને કારણે તે બચ્ચાઓનાં વર્તનમાં ગરબડ પેદા કરી શકે છે. મોટી છોકરીઓ પણ બેચેની અને તણાવ મહેસુસ કરી શકે છે.

જે આવી બધી બાબતો સમજે છે, તેવા એક મનોચિકિત્સક તરીકે શું હું ખતનાની ભલામણ કરીશ? ના, હું ભલામણ નહિં કરું કારણ કે, મને લાગે છે કે તેનો મુખ્ય હેતુ બૈરીઓની સેક્સ્યુઆલિટી પર નિયંત્રણ લાવવાનો છે. હું તેની વ્યાખ્યા લિંગ આધારીત હિંસા રૂપે કરીશ.

महिला जननांग विकृति के प्रति एक माँ का बहादुर फैसला

(यह लेख पहली बार 23 मई 2017 को अंग्रेजी में साहियो द्वारा प्रकाशित हुआ था. Read the English version here and the Gujarati translation here.)

लेखक: अज्ञात

उम्र: 30
देश: यूनाइटेड स्टेट्स

खतना शब्द और इस प्रथा से मेरा पहली बार आमना-सामना तब हुआ जब मैं 15 साल की थी। मैं एओएल इंस्टैंट मैसेंजर पर एक दोस्त के साथ चैटिंग कर रही थी और उसने मुझे पूछा क्या मेरा कभी खतना हुआ था। उस समय तक, मैं इस प्रथा के बारे में या इस बात से पूरी तरह अनजान थी कि इसे मेरे बोहरा समुदाय में कम उम्र की लड़कियों पर किया जाता है।  मुझे पता नहीं था कि मैं अपनी दोस्त को क्या जवाब दूँ। मैंने सोचा कि शायद मेरा खतना मेरे जन्म होने पर ही किया गया होगा, ठीक वैसे जैसे बच्चे के जन्म पर छट्ठी (नामकरण) या अक़ीका (बकरे की कुर्बानी) किया जाता है।  

मैंने फौरन ही अपनी माँ से खतना के बारे में पूछा और यह भी पूछा क्या उन्होंने मेरा कभी कराया था या नहीं। उनका जवाब था, “नहीं बेटी, मैंने तुम्हारा नहीं होने दिया था।” और अधिक फुसफुसाहट और काफी घबराई हुई आवाज़ में उनहोंने कहा, “लेकिन किसी को बताना नहीं।” मैंने उनका पीछा किया, मैं उनसे पूछ रही थी आखिर यह होता क्या है। मेरी माँ को यह समझाने में मुश्किल हुई कि यह क्या है या यह क्यों किया जाता है। वह कह पाईं कि लड़कियों के “गुप्तांग” में काटा जाता है। उन्होंने आगे कहा कि हाँ, सात साल की उम्र में वह इससे गुजर चुकी थी, लेकिन उनहोंने अपनी बेटियों के साथ ऐसा नहीं होने दिया, क्योंकि उनके खतना ने उनको भयानक शारीरिक और भावनात्मक दर्द दिया था और वो दर्द उनके साथ जीवन भर रहा है।

उस समय, मैं इस बात की अहमियत नहीं समझ पाई कि क्यों मेरी माँ ने मेरे और मेरी बहनों पर खतना नहीं करवाने का फैसला लिया और क्यों वह चाहती थी कि इसके बारे में मैं किसी से कुछ न कहूँ।

खतना के बारे में प्राथमिक जानकारी लेने के कुछ वर्षों बाद, मैं मेरी स्थानीय मस्जिद में औरतों की मीटिंग में थी। किसी ने हमारी मौलवी की बीबी, जिनको बहनसाब कहते हैं, उनसे खतना के बारे में पूछा। बहनसाब ने जवाब़ दिया कि यह औरतों में यौन आनंद को बढ़ाने के लिए किया जाता था और यह समुदाय की सभी औरतों के लिए जरूरी है। मैंने अपनी माँ से कुछ साल पहले इससे ठीक उल्टी बात सुनी थी, और बहनसाब की बातें मुझे चक्कर में डाल रही थीं। हाँ, जब बहनसाब ने कहा कि यह प्रथा सब औरतों के लिए जरूरी थी, तब मुझे समझ में आया की क्यों मेरी माँ ने मुझे किसी को यह बताने से मना किया था कि मेरा खतना नहीं हुआ है। मेरी माँ को डर था समुदाय के आदेश के खिलाफ जाने पर उनके या उनके परिवार के साथ बुरा हो सकता था, और इसीलिए, उनहोंने अपना प्रगतिशील फैसला सब से छुपा के रखा।

आज, एक व्यस्क महिला के रूप में मैं खतना के शारीरिक और भावनात्मक नुक्सान को समझ सकती हूँ, और मैं अपनी माँ के फैसले की सराहना करती हूँ। मैं सोच भी नहीं सकती हूँ जिन महिलाओं के साथ यह हुआ उनको अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में क्या झेलना पड़ता होगा। मुझे लगातार डर लगता है कि यह प्रथा अभी भी जारी है (हालाँकि यह अधिकतर गुप्त है) और “परंपरा” के अलावा अधिकतर लोगों के पास कोई वाजिब मेडिकल कारण नहीं हैं इसे  जारी रखने के लिए। मुझे उम्मीद है कि जैसे-जैसे लोग इस प्रथा और इससे जुड़े नुक्सान के बारे में जानते जाएँगे, समुदाय के भीतरसे परंपरा के नाम पर छोटी बच्चियों के अंग की विकृति की इस नुक्सानदायक प्रथा को रोकने की कोशिशें बढ़ती जाएँगी।

मैंने अपनी मां से मेरा खतना नहीं करने की विनती की। उन्होंने मेरी बात सुनी

(This article was originally published in English on November 8, 2016. Read the English version here.)

नाम: अज्ञात

उम्र: 26

देश: संयुक्त राज्य अमेरिका

शनिवार की स्कूल की क्लास में मैंने पहली बार इसके बारे में सुना। एक पुरुष शिक्षक उस शनिवार की सुबह हमारी क्लास में पढ़ा रहे ते, और विषय था खतना। उस 14 वर्ष की उम्र में, मुझे वास्तव में पता नहीं था कि इसका मतलब क्या है, लेकिन मुझे पता था कि इसमें कुछ ऐसा शामिल था जो यौन-शिक्षा से संबंधित था। मैं शर्मिंदगी भरी स्थिति में कमरे के दाईं ओर लड़कियों के साथ बैठी थी, और लड़के कमरे के बाईं ओर बैठे थे। शिक्षक ने पुरूष खतना के बारे में बोलना शुरू किया; कहा कि उसमें त्वचा को सर्जरी के द्वारा हटा दिया जाता है, स्वच्छता के लिए। उसके बाद उन्होंने महिला खतना के बारे में बताया; कि यह एक लड़की की यौन इच्छा पर अंकुश लगाने के लिए किया जाता था। लड़कियों को पवित्र, शांत और आज्ञाकारी बनाना था। छोटी लड़कियों का खतना करना उन्हें असंयमित होने से बचाने का एकमात्र तरीका था। यह उनके परिवारों को शर्मिंदा होने से रोकने का एकमात्र तरीका था।

मुझे याद है कि वहां बैठकर मुझे पता नहीं था कि मेरे शिक्षक किस बारे में बात कर रहे हैं। मुझे यकीन था कि मैं कभी भी इस प्रक्रिया से नहीं गुज़री थी। मैं उस दिन उस कमरे में बैठी हुई बहुत असहज और अशांत महसूस कर रही थी।

मुझे याद है कि उसी शनिवार को हम सहेलियां क्लास की एक बड़ी लड़की के घर रहने गए थे, जहाँ पर उस दिन क्लास में जो सुना था उस विषय पर बात होने लगी। मैं चुपचाप बैठी रही जब एक दूसरी लड़की ने समझाया कि यह प्रक्रिया लड़कियों पर क्यों की जाती है, कैसे यह हमें बेहतर मुसलमान और बेहतर बोहरा बनती है, क्योंकि खतना यह सुनिश्चित करता है कि हम में यौन इच्छाओं और विवाह पूर्व संभोग की चाह नहीं जगेगी। खतना ने हमें पवित्र किया था, हमें शुद्ध किया था। मैंने गौर से सुना जब अन्य लड़कियों ने अपनी खतना की कहानियों बताई। मुझे धोखा महसूस हो रहा था क्योंकि मुझे पता था कि मैं कभी भी इस “ज़रूरी प्रथा” से नहीं गुजरी थी। उस वक़्त मुझे इस ‘ज़रूरी प्रथा’ का सही मतलब नहीं पता था। मेरी समझ में सिर्फ यह आ रहा था कि मै उन लड़कियों के जैसी नहीं थी, कि मैं एक “बुरी लड़की” थी, कि मैं गंदी थी, और मैं सिर्फ एक अच्छी मुस्लिम होने का नाटक कर रही थी।

मुझे याद है कि आखिरकार कुछ हफ्तों बाद मैंने अपनी माँ से इसके बारे में पूछने की हिम्मत जुटाई। उम्मीद भरी आवाज़ से मैंने उनको पूछा कि क्या मेरे साथ यह हुआ था, और बस मुझे याद नहीं था? उनका चेहरा बदल गया । उन्होंने अपना सिर हिलाया। जब हम भारत में थे तब उनको हमेशा मेरे मेरा खतना करवाना था, लेकिन कभी मौका नहीं मिला। मैंने उनको अपने दोस्तों से सुनी हुई कहानियाँ सुनाईं और उनसे पूछा, क्या वह मुझे इस प्रक्रिया को समझा सकती हैं, क्योंकि मुझे अपनी क्लास में इसे समझने में परेशानी हुई थी। उन्होंने मुझे खतना की प्रक्रिया समझाना शुरू किया; कैसे एक लड़की के भगशेफ या क्लाइटोरिस से त्वचा को हटाया जाता है, उसे पवित्र और शुद्ध बनाने के लिए। जैसे ही मैंने पूरी बात सुनी, मैं डरकर पीछे हट गई। उन्होंने मुझे कुछ मिनटों तक देखा, और फिर अधिकार के साथ कहा कि अगली बार जब हम भारत जाएंगे, तो वह मुझे मेरी चाची, जो एक डॉक्टर हैं, उनके पास ले जाएँगी जो मुझ पर खतना करवाएंगी। मैं उनके सामने अपने घुटनों के बल बैठ गई, उनसे भीख माँगते हुए कि मेरे साथ यह न करें, भीख माँगते हुए कि इस अकल्पनीय दर्दनाक प्रक्रिया से ना गुजरने दें। मैंने उनसे वादा किया कि मैं अच्छी रहूँगी, मैं स्वच्छ रहूँगी, मैं वह कुछ भी करूँगी जो वह चाहती थी अगर वह इस पूरी बात को भूल जाएँगी। उनहोंने सिर्फ इतना कहा कि “हम देखेंगे।”

मुझे याद है बड़े होते हुए, मैं खतना के बारे में और अधिक शोध करती रही यह जानने के लिए कि आख़िर यह होता क्या है। एक बार मेरे चचेरे भाई ने बड़े जोश से बताया कि यह कितना गलत है। तब मुझे एहसास हुआ कि मेरी माँ ने मुझे कितने बड़े नुकसान से बचाया है।  आज मैं खतना को बहुत अलग नज़र से देखती हूँ।

कई युवा लड़कियों से उनका चुनने का अधिकार छीन लिया गया है। किसी ने उनसे नहीं पूछा कि क्या वे खतना कराना चाहते हैं। उनके परिवारों ने उनके अस्तित्व के एक हिस्से को चुराने का फ़ैसला कर लिया, इस बारे में कोई परवाह किए बिना कि इसका उन पर क्या असर होगा, और अक्सर अपनी अनमोल छोटी बच्चियों को अस्वच्छ और अनुभवहीन हाथों में देने का निर्णय लिया।

मुझे याद है कि महीनों पहले एक बड़ी फेसबुक चर्चा खुलकर बाहर आई, जिसमें मेरे पहचान की एक बहुत ही मुखर लड़की ने खतना के खिलाफ आंदोलन करने वालों पर पर आरोप लगाया कि वे बोहरा समुदाय की “गंदगी” को पब्लिक में बाहर ला रहे थे। उस पल के पहले मैंने अपने समुदाय के किसी व्यक्ति पर इतनी शर्म महसूस नहीं की थी। यह प्रथा गलत है, और इसका गैर-रजामंदी वाला स्वरूप मेरे लिए इसे और भी दिल दहलाने वाला और निंदनीय बनाता है। जब आपका समुदाय कुछ ग़लत कर रहा है, और इसे पैगंबर (अल्लाह उनको शांति दे) द्वारा सिखाई गई एक धार्मिक प्रथा के रूप में बता रहा है, तब आप इससे छिपकर भाग नहीं सकते हैं। आपको बहस करने के लिए मुँह खोलना पड़ेगा और चर्चा करना होगा कि हम एक समुदाय के रूप में बेहतर कैसे बन सकते हैं। आपको चर्चा करना होगा कि हम अपने समुदाय की युवा लड़कियों और युवा महिलाओं की सुरक्षा कैसे कर सकते हैं।

एक वैश्विक समुदाय होने के नाते हम इसे रोकने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। मेरी मां ने मुझे बचाया था। उन्होंने मेरे लिए अपने प्यार को सबसे पहले रखा, और आज उनकी वजह से मैं एक पूर्ण महिला हूँ। मैं उनकी सुरक्षा और मार्गदर्शन के लिए हमेशा आभारी हूं। सभी युवा महिलाएँ अपने शरीर पर समान सुरक्षा, समान प्रेम, समान सम्मान और समान अधिकार की हक़दार हैं। इतना तो कम से कम हम कर सकते हैं।

मेरी अनुमति के बिना मेरे सबसे गुप्त अंगों को काटा गया

(This article was originally published in English on November 5, 2016. Read the English version here.)

उम्र: 64

देश: संयुक्त राज्य अमेरिका

महिला जननांग विकृति या FGM के खिलाफ खड़े होने का समय आ गया है। यह लंबे समय से बाकी है। यह तब भी सही नहीं था जब मेरी माँ इससे गुज़री, यह तब भी सही नहीं था जब मैं इससे गुज़री और यह तब भी सही नहीं था जब मैंने अपनी बेटी के साथ यह होने दिया (मेरे माता-पिता के दबाव में)।

जिस दिन भारत में मेरे साथ एफजीएम किया गया था, मुझे उस दिन की याद है। मैं लगभग छह या सात साल की थी। मेरे भाई, जो मुझसे उम्र में बड़ा था, उसको एक दोस्त के घर पर खेलने के लिए दूर भेज दिया गया था। एक महिला, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था, वह आयी और मुझे मेरे माता-पिता के बेडरूम में ले जाया गया जहां एफजीएम किया गया था।

मुझे लगता है कि उस घटना और उस दिन की असहज स्मृति को मैंने दबा दिया है – बस उस महिला और मुझे नीचे लिटाए रखने वाली मेरी माँ की तस्वीर को छोड़कर। मुझे याद नहीं है कि खतना के पीछे का कौनसा कारण मुझे बताया गया था। लेकिन मुझे याद है कि मेरी अनुमति के बिना मेरे शरीर के सबसे गुप्त अंग के साथ जो किया गया था, उससे मैं बहुत नाराज़ थी। यह मेरे जिस्म पर अतिक्रमण था। सबसे अधिक, मुझे इस बात पर नाराजगी है कि जिस व्यक्ति पर मैंने उस छोटी उम्र में जीवन में सबसे अधिक भरोसा किया था, उनहोंने मेरे साथ ऐसा होने दिया। हो सकता है, इसीलिए, मेरा एक हिस्सा है जो मेरी माँ को माफ नहीं कर सकता है और मुझे आश्चर्य है कि मेरी बेटी ने मुझे उसी काम को करने के लिए माफ कर दिया है।

एफजीएम को सही दिखाने के लिए इसे धर्म के लिबास में ढका जा रहा है। पर जल्द ही साहियो जैसे संगठन इस क्रूर प्रथा को बंद कर देंगे। जब तक सैयदना एफजीएम की निंदा नहीं करते हैं, और अपनी बात अमल नहीं करते हैं, तब तक मुझे खुद को दाउदी बोहरा कहने में शर्म आएगी।

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By Anonymous

No cuts, no wounds, but deep empathy for my sisters.
I came to NY for the 4th time but for an entirely different circumstance.

Being part of the Bohra community, I have made countless connections, some of who have been integral in my life. Yet, I still felt distant from the community that often lacked logic and ran high on emotion. Weird though, since I am kind of the same way at times.
Learning about FGM for the first time at 14, everything shifted. I have always had an ability to empathize with others, but this was something utterly outside of my scope.

I bowed my head and accepted that I will never understand the magnitude of this trauma,
but I can surely become part of a movement and advocate alongside. I can use my voice.
I can use my ability to empathize as a tool to heal the traumatic wounds.

The 2nd annual Sahiyo Retreat was nothing short of inspirational bliss.
I felt recharged.
I felt motivated.
I felt empowered.
To hear each survivor’s story and understand ways to take action–
it has become a movement.
A movement that I want to walk with.

While energy can subside, the power of one weekend
still buzzes in my heart.

Knowledge, trauma, empowerment, change, community- all words
That have taken on a new meaning entirely.

As I wait for the next retreat, I continue to ask my self
What can I do, learn, ask different every day
to continue to be well-informed and a true
activist.

Thank you, Sahiyo
For bestowing this buzz of energy
And for helping me connect the
missing link
of emotion and logic.
And that link is
SISTERHOOD.

टैटू, महिला खतना और पाखंड

(This piece was originally published in English on November 25, 2016. Read the English version here.)

अज़रा एदनवाला

उम्र: 21

देश: अमेरिका / भारत

कुछ समय पहले मैं साहियो नाम के एक संगठन से मुख्तलिफ हुई। उस समय तक मैंने अपने खतने के बारे में कभी सोचा नहीं था। सच कहु तो मुझे पता ही नहीं था की इसका मतलब क्या है। जब मैंने उन महिलाओं के लेखों को पढ़ा, जिनका खतना हुआ था, तब मुझे एहसास हुआ की इस भयानक परंपरा का एक शिकार मैं भी थी। मैंने तो बस इस याद को अंतर्मन में दबा दिया था, क्यूंकि मैं नहीं जानती थी की ये परंपरा कहाँ से आयी और इसका मतलब क्या है।

मैं शायद 5 या 6 साल की थी। अपने परिवार के साथ छुट्टी पर थी। गुजरात में कोई इलाका था, जहाँ तक मुझे याद है। इसके अलावा और कुछ याद नहीं, सिवाय दर्द से भरे कुछ छितरे-बिटरे पलों की।

मुझे एक गंदे से बाथरूम में ले जाया जाना याद है, साथ में एक पुरूष या एक महिला थीं, सफ़ेद कपड़ों में। मुझे कैंची याद है, और मुझे खून देखना याद है। मुझे रोना याद है। क्योंकि मेरे जननांगों पर एक पट्टी लगाई गई थी। मुझे याद नहीं है कि किसी ने मुझे बताया हो, कि मेरे साथ अभी यह सब क्या हुआ था या क्यों हुआ था। सब कुछ हमेशा की तरह चलता रहा, मानो कुछ घटा ही न हो। और मैंने भी उसे मान लिया, क्यूंकि मुझे यह पता ही नहीं था की मेरे शरीर के साथ क्या किया गया है।

वैसे तो मेरे खतना ने न ही मेरे मन पे कोई गहरी छाप छोड़ी है, न ही मेरे जीवन जो किसी तरह बदला है।

हालांकि जो चीज़ मुझे खुरेदती है वह यह है की आखिर ये शरीर मेरा है, और किसी को भी इसे बदलने का कोई भी अधिकार न तो कभी था, न है। खासकर वैसे हानिकारक बदलाव जो “जैसे चलता है, वैसे चलने दो” की सोच के साथ आएं।

तीन साल पहले मैंने अपना पहला टैटू करवाया था। जब मेरे एक रिश्तेदार ने मेरे शरीर पर इस टैटू को देखा, तो उन्होंने कहा, “तुम मुस्लिम हो। और हमारा धर्म यह बताता है कि शरीर को ठीक उसी तरह अपनी कब्र में लौटना चाहिए, जैसा की वह माँ की कोक से निकला था। दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो हमें अपने शरीर में कोई बदलाव नहीं करना चाहिए और इसे वैसे ही स्वीकार करना चाहिए जैसा की हमें अल्लाह ने दिया है। अगर ऐसा है, तो मेरे गुप्तांगों को क्यों काट दिया गया? यह कैसा पाखंड है?

कोई भी धर्म सिर्फ अपने सुविधानुसार अपने नियम नहीं बना सकता। हमें यह समझना होगा की धर्म आखिर हमीं ने बनाया है, और हमें उन रीती-रिवाज़ो का पालन करना छोड़ना होगा जो परंपरा के नाम पर चलती आ रही है।

हम एक आधुनिक समाज में रहते हैं, और जहां हम अभी हैं उस जगह पर हम इसलिए पहुँचे हैं क्योंकि हमने परिवर्तन को अपनाया। महिला जननांग खतना इस्लाम में एक महिला के आस्था को निर्धारित नहीं कर सकता है। मुझे यह प्रथा बड़ी छिछली लगती है, और मुझे नहीं लगता कि किसी को भी इस प्रथा का पालन करना चाहिए, विशेष रूप से छोटे बच्चों को, जिनको पता ही नहीं है कि उनके साथ क्या हो रहा है।

हो सकता है की खतना का मुझपर ज़्यादा गहरा असर नहीं पड़ा है, लेकिन ऐसी बहुत सी महिलाएं है जिन पर असर हुआ है। प्रत्येक महिला को अपने शरीर पर अधिकार होना चाहिए क्योंकि ऐसे भगवन में विश्वास रखने का कोई मतलब नहीं है जो जाहिर तौर पर ऐसी भयानक और अमानवीय प्रथा का समर्थन करते हैं।

Calling survivors of female genital cutting and health providers for a unique storytelling opportunity

Apply to be a storyteller here!

In November 2019, Sahiyo and StoryCenter will partner with The George Washington University Milken Institute School of Public Health to host a digital storytelling workshop in Washington, D.C. Sahiyo is advocating for the abandonment of female genital mutilation/cutting (FGM/C), while StoryCenter supports organizations in using storytelling and participatory media for social change.

The November workshop will focus on health and female genital cutting. With that focus in mind, Sahiyo extends an invitation to: 1) women over 18 years old, living in the United States, who have undergone FGM/C and who have a story to share about receiving healthcare in the U.S. or 2) health providers in the United States, of all genders (i.e. physicians, nurses, midwives, etc.) who have provided services to women who have undergone FGM/C.

Together these groups can highlight stories about the enduring impact of FGM/C on women’s health and/or inform health professionals of the kind of care and best practices health professionals need to be aware of when working with FGM/C survivors. The resulting short digital stories will be used to better educate health professionals on how to support survivors living in the U.S..

Sahiyo’s Inaugural Storytelling Workshop

In 2018, Sahiyo, in partnership with StoryCenter, launched an inaugural digital storytelling workshop. Nine women’s stories have since elevated the conversation about FGM/C in the U.S. and globally. The stories were distributed online and via media channels, as well as at live community screening events. They are being used as educational tools to support discussion among survivors within their communities, with a focus on challenging the social norms sanctioning FGM/C, and encouraging an end to the practice.

About Sahiyo:

Since 2015, Sahiyo has been advocating for the abandonment of FGM/C through dialogue, education and collaboration. Sahiyo conducted the first-ever international online survey of Dawoodi Bohra women on the subject of FGM/C. Read the full report here

About StoryCenter: 

StoryCenter creates spaces for transforming lives and communities, through the acts of listening to and sharing stories as a vehicle for education, community mobilization, and advocacy. They collaborate with organizations around the world on workshops in story facilitation, digital storytelling, and other forms of participatory media production. Individuals are encouraged to register for storytelling workshops. 

About The George Washington University’s Milken Institute School of Public Health:

GWU has been working closely with survivors and health care providers to develop a living virtual educational toolkit (fgmtoolkit.gwu.edu).

If you would like to participate in the workshop, apply by October 14th via this link:  http://bit.ly/DC_VoicesEndFGMC.

View informational flyer here.

 

 

 

The Sahiyo Activist Retreat gave me insight on how to talk about FGM/C

By Alifya Sulemanji

Age: 45

Country of Residence: United States

I was looking forward to attending the second Sahiyo Activist Retreat as it is a great platform to meet more women who are standing up for the abandonment of female genital mutilation/cutting (FGM/C). I was happy to meet women from different parts of the United States. It was a great experience to hear different views of women of all age groups. It is encouraging to see more and more women join every year. 

FGM/C has always been a very sensitive issue for me, as I had been through this atrocity myself and would never want another innocent child to go through it. 

As I mentioned in my prior post about the first retreat, I have a very vivid memory of being cut at the tender age of seven. It felt like my body was being violated. Even when I was just 7 years of age, I knew something wrong had been done to me as I was told that this thing was a dark secret I was not supposed to tell anyone about. As I grew up I found out that none of my other friends had this religious ritual done, and it confirmed that what had been done to me was wrong. In the past few years, I learned that many other women like me felt the same way. 

The Sahiyo Activist Retreat gave me insight into how I can talk to other pro-FGM/C people and how I can convey my thoughts on FGM/C to them in a positive way.

Sahiyo has created a strong platform for women like me to come out and express their grief and opinions to create awareness.

Launching Global Voices to End FGM/C – An Online Digital Storytelling Workshop

On June 1, Sahiyo and StoryCenter launched a pilot online digital storytelling workshop – Global Voices to End FGM/C, which is supporting ten women impacted by female genital cutting in sharing and audio-recording their stories. 

During June, storytellers attended a series of webinars that helped highlight the storyteller process and how to go about drafting their story scripts as well creating a storyboard for their digital story. During July and August, the storytellers will continue working on their digital stories by collecting illustrations for their stories. The stories will be illustrated with a combination of personal images (photos and video clips) provided by the storytellers, and images contributed by participating women artists. 

The storytellers come from a variety of countries including:  Tanzania, United Kingdom, India, Sweden, Singapore, and Bahrain. “As a survivor of FGC, it is empowering to be able to share my story in my own words, with my own choice of visuals, as opposed to my story being told by someone else,” said Aarefa Johari, one of the participants of the workshop. 

All participants’ digital stories will be released in late September.