महिला जननांग विकृति के प्रति एक माँ का बहादुर फैसला

(यह लेख पहली बार 23 मई 2017 को अंग्रेजी में साहियो द्वारा प्रकाशित हुआ था. Read the English version here and the Gujarati translation here.)

लेखक: अज्ञात

उम्र: 30
देश: यूनाइटेड स्टेट्स

खतना शब्द और इस प्रथा से मेरा पहली बार आमना-सामना तब हुआ जब मैं 15 साल की थी। मैं एओएल इंस्टैंट मैसेंजर पर एक दोस्त के साथ चैटिंग कर रही थी और उसने मुझे पूछा क्या मेरा कभी खतना हुआ था। उस समय तक, मैं इस प्रथा के बारे में या इस बात से पूरी तरह अनजान थी कि इसे मेरे बोहरा समुदाय में कम उम्र की लड़कियों पर किया जाता है।  मुझे पता नहीं था कि मैं अपनी दोस्त को क्या जवाब दूँ। मैंने सोचा कि शायद मेरा खतना मेरे जन्म होने पर ही किया गया होगा, ठीक वैसे जैसे बच्चे के जन्म पर छट्ठी (नामकरण) या अक़ीका (बकरे की कुर्बानी) किया जाता है।  

मैंने फौरन ही अपनी माँ से खतना के बारे में पूछा और यह भी पूछा क्या उन्होंने मेरा कभी कराया था या नहीं। उनका जवाब था, “नहीं बेटी, मैंने तुम्हारा नहीं होने दिया था।” और अधिक फुसफुसाहट और काफी घबराई हुई आवाज़ में उनहोंने कहा, “लेकिन किसी को बताना नहीं।” मैंने उनका पीछा किया, मैं उनसे पूछ रही थी आखिर यह होता क्या है। मेरी माँ को यह समझाने में मुश्किल हुई कि यह क्या है या यह क्यों किया जाता है। वह कह पाईं कि लड़कियों के “गुप्तांग” में काटा जाता है। उन्होंने आगे कहा कि हाँ, सात साल की उम्र में वह इससे गुजर चुकी थी, लेकिन उनहोंने अपनी बेटियों के साथ ऐसा नहीं होने दिया, क्योंकि उनके खतना ने उनको भयानक शारीरिक और भावनात्मक दर्द दिया था और वो दर्द उनके साथ जीवन भर रहा है।

उस समय, मैं इस बात की अहमियत नहीं समझ पाई कि क्यों मेरी माँ ने मेरे और मेरी बहनों पर खतना नहीं करवाने का फैसला लिया और क्यों वह चाहती थी कि इसके बारे में मैं किसी से कुछ न कहूँ।

खतना के बारे में प्राथमिक जानकारी लेने के कुछ वर्षों बाद, मैं मेरी स्थानीय मस्जिद में औरतों की मीटिंग में थी। किसी ने हमारी मौलवी की बीबी, जिनको बहनसाब कहते हैं, उनसे खतना के बारे में पूछा। बहनसाब ने जवाब़ दिया कि यह औरतों में यौन आनंद को बढ़ाने के लिए किया जाता था और यह समुदाय की सभी औरतों के लिए जरूरी है। मैंने अपनी माँ से कुछ साल पहले इससे ठीक उल्टी बात सुनी थी, और बहनसाब की बातें मुझे चक्कर में डाल रही थीं। हाँ, जब बहनसाब ने कहा कि यह प्रथा सब औरतों के लिए जरूरी थी, तब मुझे समझ में आया की क्यों मेरी माँ ने मुझे किसी को यह बताने से मना किया था कि मेरा खतना नहीं हुआ है। मेरी माँ को डर था समुदाय के आदेश के खिलाफ जाने पर उनके या उनके परिवार के साथ बुरा हो सकता था, और इसीलिए, उनहोंने अपना प्रगतिशील फैसला सब से छुपा के रखा।

आज, एक व्यस्क महिला के रूप में मैं खतना के शारीरिक और भावनात्मक नुक्सान को समझ सकती हूँ, और मैं अपनी माँ के फैसले की सराहना करती हूँ। मैं सोच भी नहीं सकती हूँ जिन महिलाओं के साथ यह हुआ उनको अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में क्या झेलना पड़ता होगा। मुझे लगातार डर लगता है कि यह प्रथा अभी भी जारी है (हालाँकि यह अधिकतर गुप्त है) और “परंपरा” के अलावा अधिकतर लोगों के पास कोई वाजिब मेडिकल कारण नहीं हैं इसे  जारी रखने के लिए। मुझे उम्मीद है कि जैसे-जैसे लोग इस प्रथा और इससे जुड़े नुक्सान के बारे में जानते जाएँगे, समुदाय के भीतरसे परंपरा के नाम पर छोटी बच्चियों के अंग की विकृति की इस नुक्सानदायक प्रथा को रोकने की कोशिशें बढ़ती जाएँगी।

मेरी अनुमति के बिना मेरे सबसे गुप्त अंगों को काटा गया

(This article was originally published in English on November 5, 2016. Read the English version here.)

उम्र: 64

देश: संयुक्त राज्य अमेरिका

महिला जननांग विकृति या FGM के खिलाफ खड़े होने का समय आ गया है। यह लंबे समय से बाकी है। यह तब भी सही नहीं था जब मेरी माँ इससे गुज़री, यह तब भी सही नहीं था जब मैं इससे गुज़री और यह तब भी सही नहीं था जब मैंने अपनी बेटी के साथ यह होने दिया (मेरे माता-पिता के दबाव में)।

जिस दिन भारत में मेरे साथ एफजीएम किया गया था, मुझे उस दिन की याद है। मैं लगभग छह या सात साल की थी। मेरे भाई, जो मुझसे उम्र में बड़ा था, उसको एक दोस्त के घर पर खेलने के लिए दूर भेज दिया गया था। एक महिला, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था, वह आयी और मुझे मेरे माता-पिता के बेडरूम में ले जाया गया जहां एफजीएम किया गया था।

मुझे लगता है कि उस घटना और उस दिन की असहज स्मृति को मैंने दबा दिया है – बस उस महिला और मुझे नीचे लिटाए रखने वाली मेरी माँ की तस्वीर को छोड़कर। मुझे याद नहीं है कि खतना के पीछे का कौनसा कारण मुझे बताया गया था। लेकिन मुझे याद है कि मेरी अनुमति के बिना मेरे शरीर के सबसे गुप्त अंग के साथ जो किया गया था, उससे मैं बहुत नाराज़ थी। यह मेरे जिस्म पर अतिक्रमण था। सबसे अधिक, मुझे इस बात पर नाराजगी है कि जिस व्यक्ति पर मैंने उस छोटी उम्र में जीवन में सबसे अधिक भरोसा किया था, उनहोंने मेरे साथ ऐसा होने दिया। हो सकता है, इसीलिए, मेरा एक हिस्सा है जो मेरी माँ को माफ नहीं कर सकता है और मुझे आश्चर्य है कि मेरी बेटी ने मुझे उसी काम को करने के लिए माफ कर दिया है।

एफजीएम को सही दिखाने के लिए इसे धर्म के लिबास में ढका जा रहा है। पर जल्द ही साहियो जैसे संगठन इस क्रूर प्रथा को बंद कर देंगे। जब तक सैयदना एफजीएम की निंदा नहीं करते हैं, और अपनी बात अमल नहीं करते हैं, तब तक मुझे खुद को दाउदी बोहरा कहने में शर्म आएगी।

टैटू, महिला खतना और पाखंड

(This piece was originally published in English on November 25, 2016. Read the English version here.)

अज़रा एदनवाला

उम्र: 21

देश: अमेरिका / भारत

कुछ समय पहले मैं साहियो नाम के एक संगठन से मुख्तलिफ हुई। उस समय तक मैंने अपने खतने के बारे में कभी सोचा नहीं था। सच कहु तो मुझे पता ही नहीं था की इसका मतलब क्या है। जब मैंने उन महिलाओं के लेखों को पढ़ा, जिनका खतना हुआ था, तब मुझे एहसास हुआ की इस भयानक परंपरा का एक शिकार मैं भी थी। मैंने तो बस इस याद को अंतर्मन में दबा दिया था, क्यूंकि मैं नहीं जानती थी की ये परंपरा कहाँ से आयी और इसका मतलब क्या है।

मैं शायद 5 या 6 साल की थी। अपने परिवार के साथ छुट्टी पर थी। गुजरात में कोई इलाका था, जहाँ तक मुझे याद है। इसके अलावा और कुछ याद नहीं, सिवाय दर्द से भरे कुछ छितरे-बिटरे पलों की।

मुझे एक गंदे से बाथरूम में ले जाया जाना याद है, साथ में एक पुरूष या एक महिला थीं, सफ़ेद कपड़ों में। मुझे कैंची याद है, और मुझे खून देखना याद है। मुझे रोना याद है। क्योंकि मेरे जननांगों पर एक पट्टी लगाई गई थी। मुझे याद नहीं है कि किसी ने मुझे बताया हो, कि मेरे साथ अभी यह सब क्या हुआ था या क्यों हुआ था। सब कुछ हमेशा की तरह चलता रहा, मानो कुछ घटा ही न हो। और मैंने भी उसे मान लिया, क्यूंकि मुझे यह पता ही नहीं था की मेरे शरीर के साथ क्या किया गया है।

वैसे तो मेरे खतना ने न ही मेरे मन पे कोई गहरी छाप छोड़ी है, न ही मेरे जीवन जो किसी तरह बदला है।

हालांकि जो चीज़ मुझे खुरेदती है वह यह है की आखिर ये शरीर मेरा है, और किसी को भी इसे बदलने का कोई भी अधिकार न तो कभी था, न है। खासकर वैसे हानिकारक बदलाव जो “जैसे चलता है, वैसे चलने दो” की सोच के साथ आएं।

तीन साल पहले मैंने अपना पहला टैटू करवाया था। जब मेरे एक रिश्तेदार ने मेरे शरीर पर इस टैटू को देखा, तो उन्होंने कहा, “तुम मुस्लिम हो। और हमारा धर्म यह बताता है कि शरीर को ठीक उसी तरह अपनी कब्र में लौटना चाहिए, जैसा की वह माँ की कोक से निकला था। दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो हमें अपने शरीर में कोई बदलाव नहीं करना चाहिए और इसे वैसे ही स्वीकार करना चाहिए जैसा की हमें अल्लाह ने दिया है। अगर ऐसा है, तो मेरे गुप्तांगों को क्यों काट दिया गया? यह कैसा पाखंड है?

कोई भी धर्म सिर्फ अपने सुविधानुसार अपने नियम नहीं बना सकता। हमें यह समझना होगा की धर्म आखिर हमीं ने बनाया है, और हमें उन रीती-रिवाज़ो का पालन करना छोड़ना होगा जो परंपरा के नाम पर चलती आ रही है।

हम एक आधुनिक समाज में रहते हैं, और जहां हम अभी हैं उस जगह पर हम इसलिए पहुँचे हैं क्योंकि हमने परिवर्तन को अपनाया। महिला जननांग खतना इस्लाम में एक महिला के आस्था को निर्धारित नहीं कर सकता है। मुझे यह प्रथा बड़ी छिछली लगती है, और मुझे नहीं लगता कि किसी को भी इस प्रथा का पालन करना चाहिए, विशेष रूप से छोटे बच्चों को, जिनको पता ही नहीं है कि उनके साथ क्या हो रहा है।

हो सकता है की खतना का मुझपर ज़्यादा गहरा असर नहीं पड़ा है, लेकिन ऐसी बहुत सी महिलाएं है जिन पर असर हुआ है। प्रत्येक महिला को अपने शरीर पर अधिकार होना चाहिए क्योंकि ऐसे भगवन में विश्वास रखने का कोई मतलब नहीं है जो जाहिर तौर पर ऐसी भयानक और अमानवीय प्रथा का समर्थन करते हैं।